गोंदिया. आदिवासी गोंड समाज का उद्गम स्थल कचारगढ़ को कहा जाता है। कचारगढ़ में एशिया खंड की सबसे बड़ी प्राकृतिक गुफा है। इस गुफा में अपने पूर्वज तथा आदिवासी के धर्म संस्थापक पारी कोपार लिंगो व कलीकंकाली मां के दर्शन करने के लिए देश के 16 राज्यों के आदिवासी कोयापूनेम के दिन 22 फरवरी को कचारगढ़ गुफा में पहुंच गए हैं।
देश के लगभग 3 लाख से अधिक आदिवासी श्रद्धालु पहुंचने से इस स्थल में आस्था का महाकुंभ लग गया। गोंडी धर्म की स्थापना पारीकोपार लिंगो ने 5000 वर्ष पूर्व की थी। इस संदर्भ में धर्म प्रेमियों ने बताया कि धर्म गुरु पहांदी पारीकोपार लिंगो ने इस स्थल से धर्म का प्रचार शुरू किया।
इसलिए इस गुफा को पहांदी पारी कोपार लिंगो कचारगढ़ गुफा कहा जाता है। गोंड राजाओं ने अपने छोटे-छोटे राज्यों की स्थापना कर राज पद्धति को 4 विभाग में बांट लिया। जिसमें येरगुट्टाकोर, उम्मोगुट्टा कोर, सहीमालगुट्टा कोर तथा अफोकागुट्टा कोर का समावेश है। येरगुट्टा कोर के समूंमेडीकोट इस गणराज्य में करीतुला नाम का एक कोसोडुम नाम के पुत्र ने जन्म लिया। जिसे गण प्रमुख माना गया।
518 मीटर ऊंचाई पर गुफा
महाराष्ट्र-छत्तीसगढ़ की सीमा पर सालेकसा तहसील के अतिसंवेदनशील नक्सलग्रस्त क्षेत्र में स्थित कचारगढ़ है। इस कचारगढ़ में एशिया खंड की सबसे बड़ी प्राकृतिक गुफा है। यह गुफा 518 मीटर ऊंचाई पर स्थित है। गुफा की ऊंचाई 94 मीटर होकर 25 मीटर का गुफा का द्वार है, जो प्राकृतिक सौंदर्य से सजा हुआ है। इसी गुफा में धर्मगुरु पारीकोपार लिंगों ने निवास कर 12 अनुयायी को तथा 750 गोंड समाज के प्रचारों को धर्म की दीक्षा देकर प्रचार-प्रसार करने का मंत्र दिया।