छत्तीसगढ़ के लोकगीत और लोकनृत्य

छत्तीसगढ़ के गीत दिल को छु लेती है यहाँ की संस्कृति में गीत एवं नृत्य का बहुत महत्व है। इसीलिये यहाँ के लोगों में सुरीलीपन है। हर व्यक्ति थोड़े बहुत गा ही लेते है। और सुर एवं ताल में माहिर होते ही है। अब हम गीतों के बारे में चर्चा करेंगे एवं सुनेगें।

भोजली

पंडवानी

जस गीत

भरथरी - लोकगाथा

बाँस गीत

गऊरा गऊरी गीत

सुआ गीत

छत्तीसगढ़ी प्रेम गीत

छत्तीसगढ़ में जन्म के गीत

छतीसगढ़ी गीत - डा. मृनालिका ओझा के कण्ठ स्वर में

छतीसगढ़ी गीत - श्रीमती अर्चना पाठक के कण्ठ स्वर में

छतीसगढ़ी गीत - डा. इलिना सेन के कण्ठ स्वर में

देवार गीत

करमा

संस्कार के गीत

छत्तीसगढ़ के लोकगीत में विविधता है, गीत अपने आकार में छोटे और गेय होते है। गीतों का प्राणतत्व है भाव प्रवणता। छत्तीसगढ़ी लोकभाषा में गीतों की अविछिन्न परम्परा है।

छत्तीसगढ़ के प्रमुख और लोकप्रिय गीतों है - सुआगीत, ददरिया, करमा, डण्डा, फाग, चनौनी, बाँस गीत, राउत गीत, पंथी गीत।

सुआ, करमा, डण्डा, पंथी गीत नृत्य के साथ गाये जाते है। सुआ गीत करुण गीत है जहां नारी सुअना (तोता) की तरह बंधी हुई है। गोंड जाति की नारियाँ दीपावली के अवसर पर आंगन के बीच में पिंजरे में बंद हुआ सुआ को प्रतीक बनाकर (मिट्टी का तोता) उसकेचारो ओर गोलाकार वृत्त में नाचती गाती जाती हैं। इसालिए अगले जन्म में नारी जीवन पुन न मिलने ऐसी कामना करती है।

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